Saturday, October 29, 2011

बात होती है अयाँ, लाख छुपा कर देखो


बात होती है अयाँ, लाख छुपा कर देखो
ख़ास अपनों से कभी आँख मिला कर देखो

दिल के ज़ज्बात तो आँखों से बयां होते हैं
देखना है तो ज़माने से बचा कर देखो 

खुद जो दरिया के किनारे से गुजर जाते हैं 
मुझसे कहते हैं समंदर में नहा कर देखो 

फडफडाहट सी फिजाओं में बिखर जायेगी 
शाख पर लौटे परिंदों को उड़ा कर देखो

ख़ामुशी से भी कहानी तो बयां होती है 
आँख से उनकी ज़रा आँख मिलाकर देखो

गम सहोदर का किसी को भी रुला सकता है 
तुम कभी राम का किरदार निभाकर देखो  

गम खुशी एक ही सिक्के के हैं दोनों पहलू
एक गर पास हो दूजे को भुलाकर देखो 

चाँद नजदीक नहीं है न कभी आयेगा
लाख महलों में सितारों को सजाकर देखो

मंजिलें सिर्फ ख्यालों से नहीं मिलती हैं
ख्वाब में लाख सितारों को बुलाकर देखो

आँख में अश्क न हों और खुशी भी छलके
हार जाओगे, कभी दांव लगाकर देखो

प्यार गर करते नहीं आँख चुराते क्यूँ हो
तुम मेरे दिल से कभी दूर तो जा कर देखो

एक लम्हे में ये कर लेती हैं रिश्ता कायम
तुम निगाहों से निगाहें तो मिलाकर देखो

धूप में तनहा मुझे देख के खुश हो क्यूँ कर 
साथ साया है मेरा उसको हटा कर देखो

प्यार पर होता नहीं कोई असर नफरत का   
आब में लगती नहीं आग लगाकर देखो

तुम भी परवाज़ की मुश्किल को समझ जाओगे 
हाँथ में टूटा हुआ पर तो उठाकर देखो

बाद मरने के भी रहती हैं बदी औ नेकी 
अपने क़दमों के निशां सारे मिटा कर देखो 

बात रो रो के कहोगे तो असर क्या होगा
बात सच्ची है तो हिम्मत से बता कर देखो

बचपना कह के जिन्हें माफ़ किया करते हो
अब उन्हें उम्र की सीढ़ी पे चढ़ा कर देखो

आशियाँ प्यार का जलता हो, नहीं सूझे कुछ 
आंसुओं से ही लगी आग बुझाकर देखो 

है गुमां तुमको मिटा सकते हो हस्ती सबकी 
अपने हांथों की लकीरों को मिटा कर देखो

Friday, October 14, 2011


बे नजर है अद्ल, आजम कभी था न है न होगा ........ अद्ल - न्याय , आजम - गूँगा
जो न सच सुने वो आज़म कभी था न है न होगा .........आज़म - श्रेष्ठ

जग जीत कर जहां से जगजीत था गया जो
सुर से जुदा तो सरगम कभी था न है न होगा

मुझे छोड़ कर गया जो था वो राह का मुसाफिर
मेरा यार मुझसे बरहम कभी था न है न होगा

जो सभी के काम आये, है मकाम उसका ऊंचा
न शरफ़ करीम का कम कभी था न है न होगा  .........शरफ़ - श्रेष्ठता , करीम - दानी 

तुझे चाहता बहुत है वो ज़हीन है मगर कुछ
तेरी चाह का मुजस्सम कभी था न है न होगा

है खराब जिसकी नीयत करे लाख बार कोशिश 
वो शरीक़े आबे ज़मज़म कभी था न है न होगा ....... आबे ज़मज़म - मक्का के पवित्र कुएं का जल 

लबे तिश्नगी समंदर की बुझा रहा है दरिया  ...........तिश्नगी - प्यास
न समन्दरों में ये दम कभी था न है न होगा

Saturday, October 8, 2011

पत्थर की आँखों से ताजमहल देखा है

सपने में क्या खूब सुहाना पल देखा है
पत्थर की आँखों से ताजमहल देखा है

बैठ सहेजे छाँव उन्ही कोमल छालों को
देकर जिनको धूप हुई बेकल देखा है

मुफलिस के आंसू भी साथ नहीं देते हैं
जाते बरबस आँखों से हर पल देखा है

गुदड़ी में भी लाल छिपे होते हैं अक्सर
कीचड में भी खिलते नीलकमल देखा है

रात प्रसव पीड़ा से होकर जब भी गुजरी
हमने हर इक बार सुनहरा कल देखा है

माँ के बारे में बस इतना कह सकता हूँ  
"मैंने ममता का गीला आँचल देखा है "

माँ बापू बहना भाई हैं सच्चे रिश्ते
बाकी रिश्तों को इनका क़ायल देखा है
दिल के ज़ज्बात यूँ दिखे हर सू 
लोग हंस कर गले मिले हर सू 


आज भी है सवाल, सहरा में
आब ही आब क्यूँ दिखे हर सू


ज़िंदगी मुस्करा नहीं पाती  
चश्मे नम लोग दिख रहे हर सू 


कोई हैवान क्यूँ बना होगा
नेक इन्सां हैं पूछते हर सू



ख्वाहिशें बढ़ गयी हैं अब इतनी
आज ईमान बिक रहे हर सू



दिल कई आज रात टूटे हैं 
लोग अफ़सूरदा दिखे हर सू 



गुम कहाँ हो गयी मुहब्बत सब  
आज दिखते हैं दिलजले हर सू 



दुःख भरे दिन को अल विदा कह कर 
दीप खुशियों के जल उठे हर सू 

Friday, October 7, 2011

ख्वाब तुम्हारा मैंने कुछ ऐसे देखा है
वीराने में शीशमहल बनते देखा है

देख चमक जिसके चेहरे की तुम जलते हो 
मैंने उसको सोने सा तपते देखा है

मैं हूँ साथ, बढ़ो आगे, कहती बैसाखी
तुम जैसों को भी मंजिल पाते देखा है

जो आँखें दुनिया को देख नहीं पातीं हैं
उन आँखों से भी आँसू बहते देखा है

मत इतराओ, मैंने तपते सूरज को भी 
दरिया में छितराकर गुम होते देखा है 

सारा जीवन बीता जिसका अंधियारे में
दीपक उसके शव के सिरहाने  देखा है

एक अधूरा सपना लेकर सब जीते हैं
अपने सपने सच होते मैंने देखा है

मेरे अपनों ने वो हाल किया है मेरा
जिस पर मैंने दुश्मन को रोते देखा है


Sunday, October 2, 2011


हे बापू !!
सुनते हैं ?
ई लठिया लिहे,
ठेहुनी पे धोती चढ़ा के,
कहाँ चल देते हैं सबेरे सबेरे
कौनो सुनता है आपकी?
काहे लिए सेहत खराब करते है?
रोज उतर के जाते हैं
झाँक के चले आते है

एक बार जो किये और जो पाए
लगता है पेट नही भरा

का देखने जाते हैं ?
घूम घूम के अपनी मूर्ति से
धूल झाड़ने जाते हैं का ?
और ई आज काहे लिए जा रहे हैं ?
आज तो चैन से बैठिये
जनम दिन है आपका
आज तो नेतये खुदै चमकाएँगे
झंडा फहराएंगे
भाषण देंगे
और जाने का का नौटंकी करेंगे
...................................
...................................

लौट आये, बहुत जल्दी
का बात है
काहे इतना उदास हैं
ई देखो.... टपर टपर आंसू.....
अरे हुआ का
कुछ बताएँगे
कि हमको भी रुलायेंगे
हे बापू
आपको उदास देखते हैं न
तो मन करता है
हम भी उतर जाएँ कौनो दिन
सुना दें खूब खरी खोटी

ई जो तुम्हार नाम की माला जप जप के
कुर्सिया से चिपके हैं
ई मत सोचियेगा कि हमका कुछ पता नहीं है
सब चोट्टे हैं
यही लिए रो रहे हैं न

हे बापू, अब मोह माया छोडिये न
"रघुपति राघव राजा राम
पतित पावन सीता राम "
ई तो आप गाते थे न
तो गाते रहिये इहाँ बैठ के
काहे जाते हैं उहाँ सुनने के लिए
"रघुपति राघव राजा राम
पता न पावैं सीता राम "

शेष धर तिवारी, इलाहबाद, २ अक्टूबर २०११

Saturday, October 1, 2011


इस जहां में फिर कोई अवतार होना चाहिए
खत्म हर  कुफ्फ़ार का  ब्याभिचार होना चाहिए 

जीत से मख़्सूस होती हार, दिल के खेल में
जीतने वाला मगर दिलदार होना चाहिए

शौक जो तीमारदारी का हमें है दोस्तों
इस बिना पर क्या उन्हें बीमार होना चाहिए?

आसमां ओढ़न, बिछौना है जमी जिनके लिए
ऐ खुदा उनको तेरा दीदार होना चाहिए 

खत्म तो हो जायेंगे जो मसअले हैं दरमियां
जज़्बएकामिल हो, दिल बेख्वार होना चाहिए 

टूटना मंजूर पर झुकना नहीं मंजूर हो 
ऐसा अपनी सख्सियत से प्यार होना चाहिए 

सींचते जायेंगे हम अम्नो अमां का गुलसिता 
दिल भले हो सख्त, लालाजार होना चाहिए