Friday, October 7, 2011

ख्वाब तुम्हारा मैंने कुछ ऐसे देखा है
वीराने में शीशमहल बनते देखा है

देख चमक जिसके चेहरे की तुम जलते हो 
मैंने उसको सोने सा तपते देखा है

मैं हूँ साथ, बढ़ो आगे, कहती बैसाखी
तुम जैसों को भी मंजिल पाते देखा है

जो आँखें दुनिया को देख नहीं पातीं हैं
उन आँखों से भी आँसू बहते देखा है

मत इतराओ, मैंने तपते सूरज को भी 
दरिया में छितराकर गुम होते देखा है 

सारा जीवन बीता जिसका अंधियारे में
दीपक उसके शव के सिरहाने  देखा है

एक अधूरा सपना लेकर सब जीते हैं
अपने सपने सच होते मैंने देखा है

मेरे अपनों ने वो हाल किया है मेरा
जिस पर मैंने दुश्मन को रोते देखा है


No comments:

Post a Comment