Wednesday, June 14, 2017

तू नदी है और हैम तेरे किनारों की तरह

तू नदी है और हम तेरे किनारों की तरह
हैं फ़िदाई ख़्वाहिशें बेइख़्तियारों की तरह

तू अगर दिल में रहे शादाब ग़ुल की तर्ह तो
हम हिफ़ाजत में रहेंगे साथ ख़ारों की तरह

तू समंदर के लिए खोता है अपना ही वजूद
उस्तुवारी है हमारी चांद तारों की तरह

हम मोहब्बत की जड़ों को तर रखेंगे अश्क़ से
जो कर आँखों को हमारी आबदारों की तरह

हम जुनूने फ़त्ह में खाते रहे हैं ठोकरें
जिंदगी हमको मिली है संगजारो की तरह

सिर्फ उनको ठोकरों की अहमियत मालूम है
गिर के जो सम्हला किये हैं शहसवारों की तरह

बेमियादी ज़िन्दगी है बेमियादी मुश्किलें
दाइमी क्यूँ है उदासी ग़म के मारों की तरह

Wednesday, March 15, 2017

ये ज़हनी लाचारी कब तक

ये ज़हनी लाचारी कब तक
ख़ूद से ही अय्यारी कब तक

टू जी के जी फिर जीजा जी
घर में चोर बजरी कब तक

बीती रात झाड़ते बिस्तर
सोने की तैयारी कब तक

हमने दी आजादी कहकर
जनता से मक्कारी कब तक

जो धोखा देते हैं हमको
उनसे रिश्तेदारी कब तक

कंधे पर बैठाना जायज़
कानो में पिचकारी कब तक

दुनिया हमको मूरख समझे
ऐसी दुनियादारी कब तक

बूढ़े गुड्डे की शादी की
देश करे तैयारी कबतक

करने अभ्युत्थान धर्म का
आओगे गिरिधारी कब तक 

थक गया था तू बहुत फिर भी न हारा शुक्रिया

थक गया था तू बहुत फिर भी न हारा शुक्रिया
तेरी हिम्मत ने दिया मुझको सहारा शुक्रिया

पास मेरे कुछ नहीं था जो कि दे पाता तुझे
तेरी सुहबत में हुआ फिर भी गुजारा शुक्रिया

ख़्वाहिशें पूरी हमारी हो सकें इसके लिए
इक न इक तू तोड़ देता है सितारा शुक्रिया

हो गया दीदार तेरा नब्ज़ फिर चलने लगी
और तुझको कह रहा है जिस्म सारा शुक्रिया

हौसला बाक़ी है आ फिर से हमें बर्बाद कर
फ़ित्रतन तुझको कहेगा दिल हमारा शुक्रिया

मैं सरापा तेरे अहसानों को हूँ ओढ़े हुए
और रग रग में है इनका इस्तिआरा शुक्रिया

तेरे कुछ अल्फ़ाज़ अब भी हैं हमारे ज़हन में
आ रहे हैं वो समाअत में दुबारा शुक्रिया

गुम हुए अहबाब मुझको छोड़कर मझधार में
अज़्मे मौज़े वक़्त तुमने ही उबारा शुक्रिया

Monday, April 21, 2014

दर्द अगर खुद दवा नहीं होता

दर्द अगर खुद दवा नहीं होता 
जख्म कोई भरा नहीं होता 

तुम तसव्वुर में जब नहीं होते 
तब भी क्यूँ दूसरा नहीं होता 

ज़द पे जब हो नहीं कोई मंज़िल 
रास्ता रास्ता नहीं होता 

इसकी फितरत है सामने आना 
सच पसे आइना नहीं होता 

ज़र्द पत्ते हमें बताते हैं 
पेड़ हरदम हरा नहीं होता 

अश्क़ अफशां नहीं रहे होते 
घर किसी का बचा नहीं होता 

बच के चलता जो खुद-परस्ती से 
आदमी यूँ गिरा नहीं होता 

दर्द है ज़ख्म का रफ़ीक़ ऐसा 
जो कभी बेवफा नहीं होता 

मैं जर्रों की तरह हल्का नहीं हूँ

किसी की आँख में चुभता नहीं हूँ 
मैं जर्रों की तरह हल्का नहीं हूँ 

अभी हालात से बिखरा नहीं हूँ 
मगर सच ये भी है यकजा नहीं हूँ 

चमक मुझमे भी है खुर्शीद जैसी 
मगर मैं चाँद पर हँसता नहीं हूँ 

कोई देखे मेरे दिल में उतर कर 
समंदर हूँ मगर खारा नहीं हूँ 

फना होना है तेरे आरिजों पर 
मैं पलकों से यूँ ही गिरता नहीं हूँ 

अगर दुश्मन है तो तस्लीम कर ले 
की मैं दिल में तेरे रहता नहीं हूँ 

तुम्हारी चाह में खुद को मिटा दूँ 
समंदर! मैं कोई दरिया नहीं हूँ