Friday, August 17, 2012


ये ज़मीं जब खून से तर हो गयी है
ज़िंदगी कहते हैं बेहतर हो गयी है

हाँथ पर मत खींच बेमतलब लकीरें
ज़िस्म की रग रग सियहतर हो गयी है

बादलों ने बारहम मरहम उडेला
अब ज़मीं की भी जबीं तर हो गयी है

लोग अंतरजाल से ऐसे जुड़े हैं
हालते अख्लाक़ बदतर हो गयी है

ज़िंदगी का हाल जब पूछा किसी ने
पुरनमी आँखों की उत्तर हो गयी है

कोई  आये, अब तो ये ज़म्हूरियत भी
जैसे इक वेश्या का बिस्तर हो गयी है

बेअसर बेशर्म नेताओं की गर्दन
वक़्त पर कछुए सी भीतर हो गयी है

Wednesday, August 15, 2012

पढो प्रबत्ते सीता राम

पढो प्रबत्ते सीता राम

रघुपति राघव राजा राम


पिजरा तेरा खोल दिया है
उड़ जा उड़ जा बोल दिया है
शक्ति-हीन हैं पंख तुम्हारे
आते  नहीं तुम्हारे काम

पढो प्रबत्ते सीता राम
रघुपति राघव राजा राम

अंग्रेजों  से जान बची तो
अब अपनों के हुए गुलाम
जिन्हें गुलामी ही भाती है
होता उनका ये अंजाम

पढो प्रबत्ते सीता राम
रघुपति राघव राजा राम

झंडा  आज उठाएंगे हम
घूम घूम लहरायेंगे हम
भाषण देंगे रटे रटाये
लेंगे  गांधी जी का नाम

पढो प्रबत्ते सीता राम
रघुपति राघव राजा राम

कोमल  मन में नहीं विकार
करता है तुमको स्वीकार
जिसने गाँधी टोपी पहनी
बापू होगा उसका नाम

पढो प्रबत्ते सीता राम
रघुपति राघव राजा राम

स्वतंत्रता  दिवस की बधाई तो ले ही लीजिये
शेष धर तिवारी १५ अगस्त २०१२

Sunday, August 12, 2012

अब नसीबा ये सवरने से रहा

फिर धनक में रंग भरने से रहा
कर्ब का सूरज बिखरने से रहा 

मार तो डाला मुझे किश्तों में पर 
क़त्ल अपने नाम करने से रहा

दीनो ईमां की जिया जो ज़िंदगी 
नाम उस इंसां का मरने से रहा

मंजिले मक़सूद मुझको दिख गयी
अब मैं रस्ते में ठहरने से रहा 

जिस्म पर मरहम करो तुम लाख पर
रूह का तो घाव भरने से रहा

मौत आयेगी मुक़र्रर वक़्त पर
रोज मैं बेवज्ह मरने से रहा

ले  गया सारी उमीदें साथ वो
अब नसीबा ये सवरने से रहा