Sunday, April 15, 2012

दीप देता है शलभ को मुक्ति का भ्रम भी

दीप देता है शलभ को मुक्ति का भ्रम भी
त्याग का दिन भी, चरम आसक्ति का तम भी

प्रीति  की अनुभूति मापी जा नही सकती
कह नही सकते इसे कम या अधिकतम भी

क्षोभ हो, आनंद हो, अतिरेक हो दुःख का
चक्षु हैं सूचक, भले हैं अश्रु - उद्गम भी

देह के कुरु क्षेत्र में सुचिता युधिष्ठिर है
पार्थ सा सामर्थ्य इसमें भीष्म सा भ्रम भी

पूर्ण होती साध, लेकिन साधना उपरान्त
प्राप्त हो इच्छित करें यदि हम परिश्रम भी

प्रार्थना उपरान्त ही आराध्य मिलते हैं
साधना से साध्य तक टूटे नही क्रम भी





वास्तविकता कल्पना में मूलतः अंतर यही है

वास्तविकता कल्पना में मूलतः अंतर यही है
एक दिखती भी नही और दूसरी सबको मिली है

बीत जाती है यही सच जानने में उम्र सारी
तीरगी तो तीरगी है रोशनी तो रोशनी है

मैं अकेला चल पड़ा हूँ देखने, क्या है सफर में
मंजिलों की बात क्या उनसे हमारी कब बनी है

ज़िंदगी थक सी गयी है ज़िंदगी की खोज में खुद
एक वीराना बिछाकर ज़िंदगी अब सो रही है

मर गयीं सम्वेदानाएं, बेअसर हैं आज आँसू
पीर इनकी आज आँखों में सिमट कर रह गयी है

आज आओ प्यार से हम प्यार की बाते करें

आज आओ प्यार से हम प्यार की बाते करें
प्यार में इकरार की इनकार की बातें करें

मान जाने के लिए तुम रूठ जाती थी कभी
उस हसीं पल में हुई मनुहार की बातें करें

चाहते थे जीतना हम बंदिशों को तोड कर 
वक़्त के हाँथों मिली हर हार की बातें करें

एक दूजे की खुशी के वास्ते लांघा जिन्हें
राह में आयी हर इक दीवार की बातें करें

ज़िंदगी की जंग में हारे नही हम मौत से
फ़र्ज़ से हारे हुए अधिकार की बाते करें

टूटते सपने बहा लेते थे कंधो पर कभी
आज टूटी डोर के हर तार की बातें करें

गुल खिलाते ही रहेंगे हम हमारे बाग़ में
लोग चाहें तो भले ही खार की बातें करें

मुट्ठी में चाँद को है समंदर लिए हुए

मुट्ठी में चाँद को है समंदर लिए हुए 
रहता है हुस्नो इश्क ये मंज़र लिए हुए 

खुशियाँ हमारे गिर्द चलें साथ साथ ज्यूँ 
सखियाँ पडी हों पीछे महावर लिए हुए 

गुस्से में फैसला न करो आर पार का 
दौड़ो न बात बात में खंज़र लिए हुए 

औकात पर न जा तू मेरे ज़र्फे दिल को देख 
क़तरा है बेक़रार समंदर लिए हुए 

आँखों में उसके खूं था मगर बुत बना रहा 
मैं सामने खडा था कबूतर लिए हुए 

जब सुन रहे थे उनकी तो हांथों में फूल थे 
अपनी कही तो आज हैं पत्थर लिये हुए

Saturday, April 14, 2012

सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना

सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना
गुनह कितना हसीं था सेब खाना

रहा अव्वल तेरे हर इम्तिहां में
खुदा अब बंद कर दे आजमाना

चढ़े सूरज का मुस्तकबिल यही है
किसी छिछली नदी में डूब जाना 

दलीलें पेश करके थक चुका हूँ
सुना दो फैसला जो हो सुनाना

खुदा मैं पास तेरे आ तो जाऊं
जमीं का कर्ज बाकी है चुकाना

तुम्हारी खूबियाँ जब जानता हूँ
तुम्हारी खामियों को क्या गिनाना

महो अंजुम को है जब रश्क तुमसे
किसी इंसान को क्या मुह लगाना 

समंदर मौजज़न आँखों में हैं जो
उन्हें दरिया बनाकर क्यूँ बहाना

हमें मंजिल दिखाई दे रही है
"ज़रा आगे से हट जाए ज़माना" 

Thursday, April 12, 2012

लोग तो कहते हैं, हम भी आजमा कर देख लें

लोग कहते हैं तो, हम भी आजमा कर देख लें  
सामने पत्थर के अपना सर झुका कर देख लें 

छीन ली जिसने हमारी ज़िंदगी से हर खुशी 
आज उसके सामने फिर मुस्करा कर देख लें  

है बहुत दिन से समंदर ज़ज्ब आँखों में मेरी 
अब समंदर से कई दरिया बहा कर देख लें  

दर्द ही बढ़कर दवा बनता है, ये सच है अगर 
सब्र की भी इन्तेहाँ को आजमा कर देख लें 

उम्र भर जिसको रही शिकवा शिकायत से मेरी 
आज खामोशी उसे अपनी सुनाकर देख लें

अब ज़मीर अपना हकीकत को छुपा सकता नही 
है यही बेहतर कि सबको सच बता कर देख लें 

Sunday, April 8, 2012


इक गुनह गर हुआ नही होता
ये जहां ही बसा नही होता

नाम उसका ही रख दिया सूरज 
घर में जिसके दिया नहीं होता 

मैं अजाबों से होके गुजरा हूँ
कैसे कह दूं खुदा नहीं होता

देखने का सही नजरिया रख
चाँद छोटा बड़ा नहीं होता

नाउम्मीदी के पाँव में बेशक
एक भी आबला नहीं होता

दर्द का कुछ इलाज़ कर मौला  
अब ये बढ़ कर दवा नहीं होता

रात दिन हों भले बड़े छोटे
जौक़ इनसे जुदा नही होता

इश्क़  अंजाम तक पहुचता गर 
कोई आशिक फना नही होता


कैसे आऊँ हुज़ूर में तेरे 
क़र्ज़ जब तक अदा नही होता