Tuesday, July 23, 2013

दौरे तनहाई में ये दिल गरीब क्या करता
शायरी जो नहीं तो मैं अदीब क्या करता

आपका शौक़ है बेवज़ह जब ख़फ़ा होना
दोस्त बनता न मेरा तो रक़ीब क्या करता

ज़ख्म ताज़ा हो तो मरहम भी दर्द देता है
फिक्रमंदी में बेचारा तबीब क्या करता

चाहे ग़म में मुझे तुमने ही खुद ढकेला जब
मौत आनी ही थी मैं बदनसीब क्या करता

दोस्त यूँ ही तो कभी हो नहीं जाता दुश्मन
मिल गया छाछ से तो फिर हलीब क्या करता

हिज्र की आग को सहना हुआ जो नामुमकिन
चाँद उतरा समंदर में मुसीब क्या करता

No comments:

Post a Comment