Sunday, July 28, 2013

तू नाम पर उसी के ही भीख मांगता है
जिसने तुझे मशक़्क़्त को दास्तगह किया है

आंखों मे शाह के भी गड़ता है किरकिरी सा
वल्लाह देखिये क्या जर्रे का हौसला है

कमजोर आदमी को झुक कर उठाइये तो
हमको तो हर मुदावा इस मश्क़ में मिला है

आज़ाद मुश्किलों से है कौन इस ज़हां में
इनका तो हल भी इनसे होकर ही मिल सका है

हर रास्ते की होती है मुख्तलिफ़ सी मंजिल
अब सोच लो की तुमने क्या रास्ता चुना है

हर एक को दिया है यकसाँ मुक़द्दर उसने
दस्तेकरम से ही बस इसका क़ुफ़ुल खुला है

ऐ अहले इल्म शाइर रोज़ी की फ़िक्र भी कर
भूखे भजन तो भक्तों से भी नहीं हुआ है

रोकेगा कौन, देखो ज़न्नत के ख्वाब तुम भी
दोज़ख में पाँव रखना मुमकिन कहाँ रहा है 

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