Tuesday, October 26, 2010

नेत्र दान

कुलबुलाया मेरे मन में 
समाज सेवा का कीड़ा 
मैंने सोचा 
कुछ करना है 
किया जाय कुछ ऐसा
जो बन जाय नसीहत 
किया मैंने निश्चित 
दूंगा अपनी एक आँख 
किसी अंधे को
दर्शन कराऊंगा उसे 
इस हसीं दुनियां के 
दे  दी मैंने 
अपनी एक आँख
और खुद हो गया काना
दाहिनी आँख का स्थान 
खाली हो गया 
पर मन गर्व से भर गया था
पट्टियां खुलीं 
साथ साथ दोनों की
देखना चाहता था
मैं उसे खुश होते हुए
देखना चाहता था
वो मुझे ही सबसे पहले 
पर जो हुआ 
कभी सोचा न था ऐसा
मुझे देख वो बोला
आप लोगों ने
ये क्या कर दिया 
सबसे पहले एक 
काने को दिखा दिया
कर दिया अपशगुन
मैं क्या, सभी थे स्तब्ध 
और मैं सोच रहा था
जिसको आँख दिया
वही मुझे कह रहा है काना
ये कैसा ज़माना
पश्चाताप कर रहा था मैं
ये सोचकर कि
ये तो अभी भी अंधा है
आँख के अंधे तो 
ठीक हो जाते हैं 
नेत्रदान से 
पर दिमाग के अंधे का तो
भगवान ही मालिक है 

9 comments:

  1. कर भलाई तो झेलो बुराई .....कि प्रचलित प्रथा कि कलई खोलती एक बेहतरीन कविता भाई

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  2. बेहतरीन कविता...

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  3. bahut khoob kaha

    wapis le lo kambakht se...

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  4. आपका,लेख की दुनिया में हार्दिक स्वागत
    अच्छा लेख

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  5. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
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    कृपया अपने ब्लॉग पर से वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा देवे इससे टिप्पणी करने में दिक्कत और परेशानी होती है।

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  6. इस नए और सुंदर से चिट्ठे के साथ आपका हिंदी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  7. शानदार प्रयास बधाई और शुभकामनाएँ।

    एक विचार : चाहे कोई माने या न माने, लेकिन हमारे विचार हर अच्छे और बुरे, प्रिय और अप्रिय के प्राथमिक कारण हैं!

    -लेखक (डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश') : समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध 1993 में स्थापित एवं 1994 से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान- (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। जिसमें 05 अक्टूबर, 2010 तक, 4542 रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता राजस्थान के सभी जिलों एवं दिल्ली सहित देश के 17 राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. 0141-2222225 (सायं 7 से 8 बजे), मो. नं. 098285-02666.
    E-mail : dplmeena@gmail.com
    E-mail : plseeim4u@gmail.com
    http://baasvoice.blogspot.com/
    http://baasindia.blogspot.com/

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  8. Thanks to all for your comments and encouraging notes.

    Bhai surendra Singh Ji, aapki salaah par amal kat liya gaya hai.

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