Wednesday, September 15, 2010

सबसे घृणित प्राणी

चल रही थी बहस
सबसे घृणित प्राणी
कौन है दुनियाँ का 
एक बुजुर्ग ने कहा
वही जो लिए फिरता है 
अपनी वसीयत 
बीच में पैरों के 
बाँटता फिरता है
यहाँ, वहाँ जाने कहाँ कहाँ
हद ही हो गयी है अब तो
नहीं रहा ख़याल 
बहू और बेटी तक का
दुसरे बुजुर्ग ने पूछ लिया
मियाँ आप क्या कह रहे है
इंसानों की बात तो नहीं कर रहे हैं 
तीसरा बोला, ठीक ही तो कह रहे हैं
अगर किसी को बुरा लगता हो
तो मान ले वो 
कि वो नहीं रहा इंसान
देवता हो गया है वो
इन्द्र, चन्द्र या कोई और
ये मैं नहीं जानता
वाह रे इश्वर
सभी प्राणियों, पशु, पक्षी के लिए
बनाया ऋतु-काल 
पर मनुष्य को दे दी पूरी आजादी
बो दिया बीज बर्बादी का 
और अब रोते हो रोना आबादी का
फिर तीनो ही बुजुर्ग
पड़ गए सोच में
एक बोला, भाई 
हमारे भी तो दिन थे 
सोचा भी नहीं था 
होगा एक दिन ऐसा भी
क्या बदल गया
तब से अब तक
फिर तोडा दुसरे बुजुर्गवार ने
घनी चुप्पी को
और बोले, 
क्या हम ही नहीं है जिम्मेदार
हमें मिले थे जो संस्कार
अपने पुरखों से 
क्या बाँट सके हम 
अपने बच्चों में
हम तो लग गए नक़ल करने में
निकलने को आगे
दौड़ में हो गए शामिल
आधुनिकता की 
वक़्त रहते चेत जाते  
तो बचा लेते 
मनुष्यता को, इस पतन से 
तीसरा बोला, भाई 
बदलती क्यों जा रही है 
रिश्तों की पहचान 
हमने इतनी भी कोताही नहीं की
इन्हें बनाने में इंसान
फिर लम्बी खामोशी 
और उससे भी लम्बी साँस
तीनो जैसे पहुच गए 
आम सहमति पर
और बोले
शायद लौट रही है 
हमारी नयी पीढ़ी  
उस युग की ओर
विकसित नहीं थी सभ्यता जब 
असभ्य हो रहा है 
हमारा वर्तमान 
आधुनिकता के नाम पर 

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