Sunday, April 15, 2012

मुट्ठी में चाँद को है समंदर लिए हुए

मुट्ठी में चाँद को है समंदर लिए हुए 
रहता है हुस्नो इश्क ये मंज़र लिए हुए 

खुशियाँ हमारे गिर्द चलें साथ साथ ज्यूँ 
सखियाँ पडी हों पीछे महावर लिए हुए 

गुस्से में फैसला न करो आर पार का 
दौड़ो न बात बात में खंज़र लिए हुए 

औकात पर न जा तू मेरे ज़र्फे दिल को देख 
क़तरा है बेक़रार समंदर लिए हुए 

आँखों में उसके खूं था मगर बुत बना रहा 
मैं सामने खडा था कबूतर लिए हुए 

जब सुन रहे थे उनकी तो हांथों में फूल थे 
अपनी कही तो आज हैं पत्थर लिये हुए

Saturday, April 14, 2012

सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना

सज़ा के तौर पर दुनिया बसाना
गुनह कितना हसीं था सेब खाना

रहा अव्वल तेरे हर इम्तिहां में
खुदा अब बंद कर दे आजमाना

चढ़े सूरज का मुस्तकबिल यही है
किसी छिछली नदी में डूब जाना 

दलीलें पेश करके थक चुका हूँ
सुना दो फैसला जो हो सुनाना

खुदा मैं पास तेरे आ तो जाऊं
जमीं का कर्ज बाकी है चुकाना

तुम्हारी खूबियाँ जब जानता हूँ
तुम्हारी खामियों को क्या गिनाना

महो अंजुम को है जब रश्क तुमसे
किसी इंसान को क्या मुह लगाना 

समंदर मौजज़न आँखों में हैं जो
उन्हें दरिया बनाकर क्यूँ बहाना

हमें मंजिल दिखाई दे रही है
"ज़रा आगे से हट जाए ज़माना" 

इश्क जेरे समंदर नदी की तरह


इश्क जेरे समंदर नदी की तरह
चाँद के साथ है चांदनी की तरह

नेमतें नेक इन्सां को मिलती ही हैं
बंदगी हो अगर बंदगी की तरह

मौत का दिन है तय, क्यूँ मरें उम्र भर
ज़िंदगी को जियें ज़िंदगी की तरह

दोस्तों से कभी कुछ छिपाओ नही
बात कह दो, भले दिल्लगी की तरह

ख्वाहिशों का जहां में कहाँ अंत है
ये हैं सहराओं में तश्नगी की तरह

फ़र्ज़ अपना खुदा भूलता है कहाँ
आदमी जो रहे आदमी की तरह

रूह की ताब जब हो मयस्सर तो फिर
तीरगी भी दिखे रोशनी की तरह

एहतिराम उनका होगा मेरी वज़्म में 
शर्त ये है कि आयें सफ़ी की तरह

फ़र्ज़ को बोझ कहना मुनासिब नहीं 
ये  अकीदत की है पेशगी की तरह  













Thursday, April 12, 2012

लोग तो कहते हैं, हम भी आजमा कर देख लें

लोग कहते हैं तो, हम भी आजमा कर देख लें  
सामने पत्थर के अपना सर झुका कर देख लें 

छीन ली जिसने हमारी ज़िंदगी से हर खुशी 
आज उसके सामने फिर मुस्करा कर देख लें  

है बहुत दिन से समंदर ज़ज्ब आँखों में मेरी 
अब समंदर से कई दरिया बहा कर देख लें  

दर्द ही बढ़कर दवा बनता है, ये सच है अगर 
सब्र की भी इन्तेहाँ को आजमा कर देख लें 

उम्र भर जिसको रही शिकवा शिकायत से मेरी 
आज खामोशी उसे अपनी सुनाकर देख लें

अब ज़मीर अपना हकीकत को छुपा सकता नही 
है यही बेहतर कि सबको सच बता कर देख लें 

Sunday, April 8, 2012

इक गुनह गर हुआ नही होता


इक गुनह गर हुआ नही होता
ये जहां ही बसा नही होता

नाम उसका ही रख दिया सूरज 
घर में जिसके दिया नहीं होता 

मैं अजाबों से होके गुजरा हूँ
कैसे कह दूं खुदा नहीं होता

देखने का सही नजरिया रख
चाँद छोटा बड़ा नहीं होता

नाउम्मीदी के पाँव में बेशक
एक भी आबला नहीं होता

दर्द का कुछ इलाज़ कर मौला  
अब ये बढ़ कर दवा नहीं होता

रात दिन हों भले बड़े छोटे
जौक़ इनसे जुदा नही होता

इश्क़  अंजाम तक पहुचता गर 
कोई आशिक फना नही होता


कैसे आऊँ हुज़ूर में तेरे 
क़र्ज़ जब तक अदा नही होता