Tuesday, May 15, 2012

न कहना मुहब्बत का मुश्किल सफ़र है



न कहना मुहब्बत का मुश्किल सफ़र है
इसी राह पर एक उनका भी घर है

किसी पर भरोसा नही कर सकेगा
अगर तेरे दिल में अगर या मगर है

अंधेरे को देखे सुने खामुशी को
नही सब में होता ये ऐसा हुनर है

नही अब मुझे डर है इन्सां से कोई
खुदा ही बना जब मेरा मोतबर है

मुक़ाबिल कभी मुफलिसों के न आना
कि उनको नही कुछ भी खोने का डर है

समंदर के हैं दोनों हाँथों में लड्डू
जो सोये तो साहिल उठे तो क़मर है

Friday, May 4, 2012

मेरी तो ज़िंदगी से मौत हार मान कर गयी
नही है डर कोई भी मेरी ज़िंदगी संवर गयी

बड़ी अजीब सी कशिश है उसकी नफरतों में भी
न उसने क़ैद ही किया न तो रिहा ही कर गयी

निगाह अब अमान पर नही करो कभी खमी
उड़ा दिये कबूतरों को हम जिधर नज़र गयी

हमें न ज़िंदगी न मौत ही दिया रकीब ने
उसी को मौत दी जो करके मुझको दरबदर गयी

किसे किसे बता दिया खुदा हसीन ये हुनर
हर एक सख्स कह रहा है ज़िंदगी गुजर गयी

फक़त फ़कीर को पता है अस्ल ज़िंदगी है क्या
अमीर ढूँढता रहा है ज़िंदगी किधर गयी

न इब्तिदा न इंतिहा में मुब्तला रहा मगर
शरीर बारहा मुझे ही दागदार कर गयी

हमें है रश्क साहिलों से, क्या नसीब है मिला
कि चूम कर उन्हें समन्दरों की हर लहर गयी

मुझे वो राह ढूंढनी है जिस पे राहबर न हों
हयात रहजनो को ही बना के राहबर गयी

Sunday, April 15, 2012

दीप देता है शलभ को मुक्ति का भ्रम भी

दीप देता है शलभ को मुक्ति का भ्रम भी
त्याग का दिन भी, चरम आसक्ति का तम भी

प्रीति  की अनुभूति मापी जा नही सकती
कह नही सकते इसे कम या अधिकतम भी

क्षोभ हो, आनंद हो, अतिरेक हो दुःख का
चक्षु हैं सूचक, भले हैं अश्रु - उद्गम भी

देह के कुरु क्षेत्र में सुचिता युधिष्ठिर है
पार्थ सा सामर्थ्य इसमें भीष्म सा भ्रम भी

पूर्ण होती साध, लेकिन साधना उपरान्त
प्राप्त हो इच्छित करें यदि हम परिश्रम भी

प्रार्थना उपरान्त ही आराध्य मिलते हैं
साधना से साध्य तक टूटे नही क्रम भी





वास्तविकता कल्पना में मूलतः अंतर यही है

वास्तविकता कल्पना में मूलतः अंतर यही है
एक दिखती भी नही और दूसरी सबको मिली है

बीत जाती है यही सच जानने में उम्र सारी
तीरगी तो तीरगी है रोशनी तो रोशनी है

मैं अकेला चल पड़ा हूँ देखने, क्या है सफर में
मंजिलों की बात क्या उनसे हमारी कब बनी है

ज़िंदगी थक सी गयी है ज़िंदगी की खोज में खुद
एक वीराना बिछाकर ज़िंदगी अब सो रही है

मर गयीं सम्वेदानाएं, बेअसर हैं आज आँसू
पीर इनकी आज आँखों में सिमट कर रह गयी है

आज आओ प्यार से हम प्यार की बाते करें

आज आओ प्यार से हम प्यार की बाते करें
प्यार में इकरार की इनकार की बातें करें

मान जाने के लिए तुम रूठ जाती थी कभी
उस हसीं पल में हुई मनुहार की बातें करें

चाहते थे जीतना हम बंदिशों को तोड कर 
वक़्त के हाँथों मिली हर हार की बातें करें

एक दूजे की खुशी के वास्ते लांघा जिन्हें
राह में आयी हर इक दीवार की बातें करें

ज़िंदगी की जंग में हारे नही हम मौत से
फ़र्ज़ से हारे हुए अधिकार की बाते करें

टूटते सपने बहा लेते थे कंधो पर कभी
आज टूटी डोर के हर तार की बातें करें

गुल खिलाते ही रहेंगे हम हमारे बाग़ में
लोग चाहें तो भले ही खार की बातें करें