Monday, January 30, 2012

अंधे को चंदा तारों से क्या लेना


अन्धे को चंदा तारों से क्या लेना
ताजमहल की मीनारों से क्या लेना 

मजबूरी में काँटों को सह लेते हैं
वरना फूलों को खारों से क्या लेना 

लिखता हूँ मैं आग जरूरत पर वरना
इक शायर को अंगारों से क्या लेना 

माँ की सेवा से ज़न्नत मिलती है जब
मंदिर मस्ज़िद गुरुद्वारों से क्या लेना

जिसने ढाई अक्षर पढ़ना सीख लिया 
उसको नफरत के नारों से क्या लेना

जुगनू तो चमकेगा, उसकी फितरत है
उसको फैले अंधियारों से क्या लेना

चूड़ी कंगन के जो दुश्मन हैं उनको 
पाजेबों की झंकारों से क्या लेना

नफरत के शोलों में जो खुशियाँ ढूँढें 
उनको रोते परिवारों से क्या लेना


Sunday, January 29, 2012

बिना मरे तो कोई भी अमर नहीं होता

सिफर सिफर ही सही बेअसर नही होता 
बिना सिफर के कभी इक अशर नही होता ..........अशर - दस की संख्या दस   


हमें वहाँ भी मुश्किलों का डर नही होता 
सफर में कोई जहाँ हमसफ़र नही होता


जहाँ न बांट सकें लोग आपसी सुख दुःख    
मकान कह लो उसे पर वो घर नही होता


मुआफ करता नही मैं रुलाने वाले को  
जो उसका मेरे ही काँधे पे सर नही होता


पढूं इक आँख से गीता क़ुरान दूजी से 
किसी भी और में मुझसा हुनर नही होता         


बिगड़ गयी है कोई बात दरमियाँ वरना
यूँ आसमां का जमी पे कहर नही होत
 
संभालना है जतन से हर एक कतरे को
गला कोई भी बिना आब तर नही होता  .......... आब - पानी 


पड़ा न होता वहीं पर ये समन्दर अब तक
जो उसकी चाह में पागल क़मर नही होता


मरूं जो अम्नो अमां के लिए तो गम कैसा
बिना मरे तो कोई भी अमर नहीं होता


वहाँ भी चाहो हमें आजमा के देखो तुम
कि मोतबर भी जहाँ मोतबर नही होता


ये आसमान है छत औ जमीं मेरा बिस्तर
रहूँ कहीं भी, कभी दर बदर नही होता


खडा हूँ राह में बस मन तुम्हारा रखने को 
बगरना भीड़ का हिस्सा ये सर नहीं होता 


गुजारी हंस के जो खारों में ज़िंदगी मैंने  
गुलों के साथ अब अपना बसर नहीं होता 


गुमां है जान गया है वो हकीकत मेरी 
हकीक़तों से जो खुद बाखबर नही होता 







Sunday, January 1, 2012

कुछ पुराने पेड़ बाकी हैं अभी तक गाँव में
पीढ़ियों की ये निशानी हैं अभी तक गाँव में

वक़्त रोने और हँसने का हमें मिलता नहीं 
छोरियाँ कजरी सुनाती हैं अभी तक गाँव में 

शादियों के जश्न में जेवनार पर समधी हँसे
गालियाँ लगती सुहानी हैं अभी तक गाँव में

बेटियों सा प्यार बहुएँ पा रहीं शायद तभी
सास के वो पाँव धोती हैं अभी तक गाँव में

आपसी रिश्तों में तल्खी आ नही पाती यहाँ
छोहरी, बायन औ सिन्नी  हैं अभी तक गाँव में

हैं हठीले आज भी गावों में सच्ची सोच के  

बातें सच्ची हैं तो सच्ची हैं अभी तक गाँव में 


छोहरी - रबी की फसल घर में आने पर सबसे पहले सत्तू बनाकर गाँव भर के छोरों छोरियों को खिलाया जाता है 
बायन - शादी या गौने की बिदाई में बहू के साथ आये लड्डू आदि मिठाइयों को गाँव भर में बांटा जाता है 
सिन्नी - गन्ने से खांड और गुड बनाने पर पहले पाग से बच्चों को खिलाया जाता है 

Wednesday, December 28, 2011

कोंख में कविता


कोंख में कविता


आज पूरी रात
सो नही पायी मैं 
सुखाती रही 
गीले शब्दों को 
गर्म साँसों की आँच पर
आंसुओं ने
कर दिया था विद्रोह
गिरते रहे टप टप टप 
भावों की भट्ठी पर 
बुझाते रहे सुलगते विचारों को
और मैं लिख न सकी
कुछ भी
अपनी सृजन शीलता पर आश्वस्त 
मैं दांत भींचे सहती रही 
अजन्मी कविता की प्रसव-वेदना
नहीं हुआ कोई असर
बादलों से मिले प्रोत्साहन का भी
खूब बढ़ाया मनोबल
पर स्वयं ही बरस गये
और 
हो गए पानी पानी
मुझे विशवास है
जन्म लेगी एक दिन
एक सुन्दर, सलोनी कविता
मेरी कोंख से
और भर जायेगी
मेरी सूनी गोंद

Friday, December 16, 2011

ये क्या हुआ कि आज बिखरने लगा हूँ मैं


ये क्या हुआ कि आज बिखरने लगा हूँ मैं
आहट से खामुशी के भी डरने लगा हूँ मैं


मंजिल की है खबर न किसी राह का पता
अब कैसी मुश्किलों से गुजरने लगा हूँ मैं

रहने लगा है साया मेरा मुझसे दूर दूर 
ऐसा गुनाह कौन सा करने लगा हूँ मैं 

जिसकी हँसी पे था मैं दिलो जान से फ़िदा 
मुस्कान पर भी उसकी, सिहरने लगा हूँ मैं 

आईना मेरा मुझसे चुराने लगा नजर
क्या आख़िरी सफ़र को संवरने लगा हूँ मैं