Wednesday, November 16, 2011

जो इन्सां को इन्सां नहीं मानते हैं
यकीनन खुदा को नहीं जानते हैं

यूँ रूठे हैं जैसे हों किस्मत हमारी
न वो मानती है न ये मानते हैं

हम इंसान की बस्तियां ढूँढने को
जमीं छोड़ कर आसमां छानते हैं

जब अपनों से खाते हैं धोखे पे धोखा
तभी पार्थ गांडीव संधानते हैं

पड़े उनकी दुखती हुई रग पे उंगली
तो नजरें हटा कर भवें तानते हैं

Monday, November 14, 2011

बेबसी में हम कभी रोते कभी हँसते रहे
मुश्किलों से बारहा हर हाल में लड़ते रहे

ज़िंदगी की आंच में जो मोम सा गलते रहे
वो मुसलसल वक़्त के सांचे में ही ढलते रहे

आज से बेहतर रहेगा कल इसी उम्मीद में
ज़िंदगी में कुछ सुहाने ख्वाब तो पलते रहे

बेगुनाही की सजा कोई सहेगा कब तलक
हो न तौहीने अदालत हम गुनह करते रहे

दे रहे फांसी सलीबों को सियासतदां यहाँ
फैसले दे कर भी मुंसिफ हाँथ ही मलते रहे

जब भी भ्रष्टाचार की दरिया से टूटा सब्रे बंद
लोग सड़कों पर उतर कर फैसले करते रहे

Thursday, November 10, 2011

सामर्थ्य हो जैसी बनाते आशियाना या किला
हिस्से हमारे जो पड़ा है वह नसीबों में मिला,
लेकिन गरीबों को टपकता झोपडा लगता किला
संतोष का सुख तो हमेशा, झोपड़ों को ही मिला

जो आप आगे बढ़ रहे हैं, आप खुश हो लीजिए
अपने सगे सम्बन्धियों पर, ध्यान थोड़ा दीजिए
ये खुश रहें तो खूब बढ़ चढ़, कर प्रशंसा ही करें
वरना जलन में तो सगे भी, बेवजह आहें भरें

सब कुछ गंवाकर जो बनाता आफिसर संतान को
फिर क्यूँ वही बेटा कुचलता, बाप के अरमान को
बेटा भुलाता बाप माँ को और अपनी पीढियाँ
क्यूँ भूलता किसने दिखाई, हैं प्रगति की सीढियाँ

बेटी अगर खुद सास को भी माँ कहे ससुराल में
फिर सास भी उस को तनूजा मानती हर हाल में
ससुराल में बेटी रहेगी यदि स्वयं बन कर बहू
तो द्वन्द तो होगा बहेगा भावनाओं का लहू

दामाद आये रोज घर यदि, तो बहुत अच्छा लगे
ससुराल यदि बेटा महीने, में गया ओछा लगे
बेटी हमारी है दुलारी, हर दुआ उसके लिए
तो क्यूँ नही घर में हमारे, भी बहू सुख से जिए

अब दान और दहेज को तो भूल जाना चाहिए
हमको हमारे पाक रिश्ते को निभाना चाहिए
एक दूजे को अगर दिल से सभी स्वीकार लें
जीवन सफल होगा हमारा प्यार देकर प्यार लें

Saturday, October 29, 2011

बात होती है अयाँ, लाख छुपा कर देखो


बात होती है अयाँ, लाख छुपा कर देखो
ख़ास अपनों से कभी आँख मिला कर देखो

दिल के ज़ज्बात तो आँखों से बयां होते हैं
देखना है तो ज़माने से बचा कर देखो 

खुद जो दरिया के किनारे से गुजर जाते हैं 
मुझसे कहते हैं समंदर में नहा कर देखो 

फडफडाहट सी फिजाओं में बिखर जायेगी 
शाख पर लौटे परिंदों को उड़ा कर देखो

ख़ामुशी से भी कहानी तो बयां होती है 
आँख से उनकी ज़रा आँख मिलाकर देखो

गम सहोदर का किसी को भी रुला सकता है 
तुम कभी राम का किरदार निभाकर देखो  

गम खुशी एक ही सिक्के के हैं दोनों पहलू
एक गर पास हो दूजे को भुलाकर देखो 

चाँद नजदीक नहीं है न कभी आयेगा
लाख महलों में सितारों को सजाकर देखो

मंजिलें सिर्फ ख्यालों से नहीं मिलती हैं
ख्वाब में लाख सितारों को बुलाकर देखो

आँख में अश्क न हों और खुशी भी छलके
हार जाओगे, कभी दांव लगाकर देखो

प्यार गर करते नहीं आँख चुराते क्यूँ हो
तुम मेरे दिल से कभी दूर तो जा कर देखो

एक लम्हे में ये कर लेती हैं रिश्ता कायम
तुम निगाहों से निगाहें तो मिलाकर देखो

धूप में तनहा मुझे देख के खुश हो क्यूँ कर 
साथ साया है मेरा उसको हटा कर देखो

प्यार पर होता नहीं कोई असर नफरत का   
आब में लगती नहीं आग लगाकर देखो

तुम भी परवाज़ की मुश्किल को समझ जाओगे 
हाँथ में टूटा हुआ पर तो उठाकर देखो

बाद मरने के भी रहती हैं बदी औ नेकी 
अपने क़दमों के निशां सारे मिटा कर देखो 

बात रो रो के कहोगे तो असर क्या होगा
बात सच्ची है तो हिम्मत से बता कर देखो

बचपना कह के जिन्हें माफ़ किया करते हो
अब उन्हें उम्र की सीढ़ी पे चढ़ा कर देखो

आशियाँ प्यार का जलता हो, नहीं सूझे कुछ 
आंसुओं से ही लगी आग बुझाकर देखो 

है गुमां तुमको मिटा सकते हो हस्ती सबकी 
अपने हांथों की लकीरों को मिटा कर देखो

Friday, October 14, 2011


बे नजर है अद्ल, आजम कभी था न है न होगा ........ अद्ल - न्याय , आजम - गूँगा
जो न सच सुने वो आज़म कभी था न है न होगा .........आज़म - श्रेष्ठ

जग जीत कर जहां से जगजीत था गया जो
सुर से जुदा तो सरगम कभी था न है न होगा

मुझे छोड़ कर गया जो था वो राह का मुसाफिर
मेरा यार मुझसे बरहम कभी था न है न होगा

जो सभी के काम आये, है मकाम उसका ऊंचा
न शरफ़ करीम का कम कभी था न है न होगा  .........शरफ़ - श्रेष्ठता , करीम - दानी 

तुझे चाहता बहुत है वो ज़हीन है मगर कुछ
तेरी चाह का मुजस्सम कभी था न है न होगा

है खराब जिसकी नीयत करे लाख बार कोशिश 
वो शरीक़े आबे ज़मज़म कभी था न है न होगा ....... आबे ज़मज़म - मक्का के पवित्र कुएं का जल 

लबे तिश्नगी समंदर की बुझा रहा है दरिया  ...........तिश्नगी - प्यास
न समन्दरों में ये दम कभी था न है न होगा