Sunday, September 12, 2010

अत्मानुशंसा

अपने जीवन में जब
न रहें खुशियाँ
औरों की बारात में
क्या ख़ाक नाचेगा
इसलिए ऐ दोस्त
कर इरादा पक्का
ये सोच कि रख सकता है
जेब में आसमान
जब इरादा हो तो
कुछ भी नामुमकिन नहीं
जरूरी नहीं की तू बनाए रामसेतु
पर पडोसी कि छत को
अपनी छत से तो जोड़
छत पे जा
पडोसी से गप्पें तो मार
मत बाँट आपनी परेशानियां
कोई नहीं सुनता
तूने क्या क्या खो दिया
किसी को मत बता
अपनी, एक दो ही हों
उपलब्धियां गिना
अत्मानुशंसा अगर कर नहीं सकता
प्रशंसा की अपेक्षा भी कैसे करेगा
इसलिए हे मानव
स्वयं को पहचान
तुमसे अधिक
तुम्हे कोई नहीं जानता
हर कोई लगा है
नीचा दिखाने में
उनके साथ खड़े हो
उनकी मदद मत कर
अपने लिए खड़ा हो
और अपने लिए सोच
क्यों कोई सोचे तुम्हारे लिए
फुर्सत कहाँ है किसी को भी

ईद मुबारक


कोई सैयद बने, मिर्ज़ा बने, पठान बने
उससे पहले वो एक सच्चा मुसलमान बने

ईद पर अब की खुदा से ये दुआ मांगूंगा
तेरा हर बन्दा एक मुकम्मल इंसान बने



ईद पर देता हूँ दुआ, मैं यही सबको
दीद हो दिलदार की तुमको, खुदा करे
काश मेरी भी तमन्ना हो जाये पूरी
मेरे लिए भी कोई, ऐसी दुआ करे

Friday, September 10, 2010

अपने बच्चों के नाम



खिलो कमल सा तुम मैं कीचड़ पर पानी सा फैला हूँ
शांत रहूँ तो साफ़ दीखता पर अन्दर से मैला हूँ
दूँगा तुमको पोषण मैं चाहे जितना विस्तार करो
पर पोषक कीचड़ और पानी से भी थोडा प्यार करो

दोहरा व्यक्तित्व



हम माल में जाते हैं
तय करते हैं
टैग से दाम और दाम से गुणवत्ता
खरीदते हैं एक हवाई चप्पल
और कुछ और जरूरी सामान
बिना चूँ चपड़ किये
नहीं करते
मोल भाव की कोशिश भी
बढ़ा हुवा सा लगता है
हमें भी अपना रुतबा
करते हैं भुगतान
रसीद को सँभालते हैं ऐसे
बेटे का जन्म प्रमाण पत्र हो जैसे
डरते हैं वापस न रखना पड़ जाय
पैसे देकर खरीदा हुवा सामान
गेट पर खड़ा सिक्यूरिटी वाला
स्वतंत्र है समझने लिए
हर किसी को चोर
बाहर आके ऐसा लगता है
कितना जरूरी काम
लटका पड़ा था कई दिनों से
निपट गया आज
हम ही
पहुचते हैं सब्जी मण्डी
हम कोई और हो जाते हैं
चूँ चपड़ तो क्या झाँव झाँव भी करते हैं
२० रुपये किलो की भिन्डी १८ रुपये में खरीदने के लिए
आधा किलो खरीद कर
बचा ही लेते हैं
एक रूपया
वाह! क्या हम और क्या हमारा देश
हम  खरीदते हैं हवाई चप्पल
एयर कंडीशंड माल से
खाने के लिए सब्जी
खरीदते हैं फुटपाथ से

जिम्मेदारी



दो सलाई शाल बुनती जा रही थीं
एक फंदा दुसरे पर डालती थी
दूसरा फंदा गले पर खा रही थी
एक बोली ये बता मेरी सखी
कब तलक हम यूँ गले मिलते रहेंगे
दूसरी का था जवाब, हौले से
जब तलक ये ऊन के गोले रहेंगे
हम तो कर पाएंगे पूरा काम अपना
एक दूजे से गले मिल कर ही बहना
हम कोई इन्सान हैं जो सोचें खुद की
हमें तो हर हाल में है शाल बुनना