Tuesday, July 16, 2013

रब्ते-बाहम में तो ज़ज्बाते निहां हैं नारवा

रब्ते-बाहम में तो ज़ज्बाते निहां हैं नारवा
पुरखुलूस अहबाब में रुस्वाइयां हैं नारवा

बादिले-नाख्वास्ता कुछ दाइमी होता नहीं
गर्दिशे-अय्याम से पसपाइयां हैं नारवा

ऐ असीराने कफ़स कोसो न तुम तक़दीर को
अब फ़िजाओं में तवक्को-ए-अमां हैं नारवा

आज के इस इन्तहाई तीरगी के दौर में
ज़ेहन में फिरती हुई परछाइयां हैं नारवा

जब तुम्हारे दर पे आने का खुदा हक है हमें
फिर तो रस्ते में मिली रुस्वाइयां हैं नारवा

रौनकें महफ़िल की तुमको शाद जब करतीं नहीं
फिर हमारी बज़्म की रंगीनियाँ हैं नारवा

ज़िंदगी ही हो गयी साझा तुम्हारे साथ जब
फिर हिसाबाते-ज़रे-सूडो-जियां हैं नारवा

Thursday, July 11, 2013

तुम्हारी ज़ुल्फ़ चेहरे पर ठहर जाती तो अच्छा था

तुम्हारी ज़ुल्फ़ चेहरे पर ठहर जाती तो अच्छा था
अगर ये ईद का ऐलान करवाती तो अच्छा था

दिखा करती है बेकल चांदनी जो बाम पर तनहा

किसी दिन काश जीने से उतर आती तो अच्छा था

खुदा  तूने बिगाड़ा है हमें देकर धड़कता दिल

सुधरने की भी कुछ सूरत नज़र आती तो अच्छा था

तलातुम* में अगर तुम दफ'अतन** मुझसे लिपट जाते     *लहरों के हिचकोले ** अचानक 

तो फिर गिर्दाब* में कश्ती उतर जाती तो अच्छा था           * भँवर

सियह-फाम अब्र* हैं बादेसबा** है साथ तुम भी हो             *काले घने बादल ** ठंढी बयार 

इसी दम क़हर हम पर वर्क़ अगर ढाती तो अच्छा था

रक़ीबों के ज़रीये भेजकर जिसको बहुत खुश हो

हमारे पास तक वो बात अगर आती तो अच्छा था

तेरी खातिर रफ़ाक़त* कर तो लूं मैं  दुश्मनों से भी             *दोस्ती 

मेरी हालत पे तेरी आँख भर आती तो अच्छा था

दस्तयाबी को झुक ज़र्फे शज़र तो देखिये

दस्तयाबी को झुका ज़र्फे शज़र तो देखिये 
बर्ग के परदे में पोशीदा समर तो देखिये 

तितलियों के रंग से अत्फाल खौफ आलूद हैं 
मज़हबी तालीम का उनपर असर तो देखिये 

मुत्मइन है आखिराश मिल जायेगी मंजिल उसे 
उस मुसाफिर का ज़रा रख्तेसफ़र तो देखिये 

क्यूँ बिना परखे कहा जाए किसी को तंग-दिल 
सीप के अन्दर निहाँ यकता गुहर तो देखिये 

रात को फुटपाथ पर जो सो गया था चैन से 
सुब्ह के अखबार में उसकी खबर तो देखिये 

शाद है जो घर बनाकर दूसरों  के वास्ते
आप उस तामीरगर का भी बसर तो देखिये 

टूट जाने पर भी सच का साथ  छोड़ेगा नहीं
आइने की सादगी को इक नज़र तो देखिये

Saturday, July 6, 2013

आँखों में तुगियानी देख

आँखों में तुगियानी देख 
फिर उनमे हैरानी देख 

साए को भी छीन लिया 
तम की कारस्तानी देख 

क़ुदरत ने आगाह किया 
फैजे ना-फ़रमानी देख 

नौपैदा को रोने दे 
चेहरों पर नूरानी देख 

अफसुर्दा जो चेहरा है 
उस पर लिखी कहानी देख

वो खुद पर भी हंसता है 
पागल की नादानी देख 

पहले से है गोर खुदी 
रिश्तों की उरियानी देख 

हाथ दिया है क़ुदरत ने 
अपना दाना-पानी देख 

रानी पर है फ़िदा गुलाम 
ये रिश्ता लासानी देख 

सच के रोने धोने दे 
हंसती बे-ईमानी देख 

खुद को राजा कहता है 
मन की ये मनमानी देख


भीगी आँखों ने मेरी ऐसा भी मंज़र देखा

भीगी आँखों ने मेरी ऐसा भी मंज़र देखा
बहता दरियाओं में लाशों का समंदर देखा


रोक पाया है कहाँ क़हर कोई क़ुदरत का
हारता ख़ाक से भी जिस्मे तनावर देखा


बेहिसी देख के इन्सां की यूँ फटे बादल
हमने कोहसार का बर्बाद कलेवर देखा


जौरे इंसान को क़ुदरत भी यूँ सहती कब तक
बदला बदला सा फ़जाओं का भी तेवर देखा


लोग गर्क़ाब हुए, दफ्न हुए जीते जी
डूबता संग के दरिया में शनावर देखा


ज़िन्दगी हार गयी मौत से लड़ते लड़ते
आस की लाश के पैरों में महावर देखा


मुन्तजिर थे जो खुदा तेरी फ़क़त रहमत के
दर बदर होते उन्हें तेरे ही दर पर देखा


अब यकीं कैसे करेगा वो खुदाई पर भी
जिनकी आँखों ने तेरा अक्से सितमगर देखा


अब न माज़ी ही बचा है न रहा मुस्तक़बिल
मौत ने आज का भी नक़्श मिटाकर देखा