Tuesday, February 12, 2013

उम्र भर धूप में नहाये हम

अश्क उनके तो पोंछ आये हम
खुद मगर मुस्करा न पाए हम

छाँव औलाद के लिए बनकर
'उम्र भर धूप में नहाये हम'

घर मकां को बना नहीं पाते
तोड़ते हैं बसे बसाये हम

शह्र ने खाब भी नहीं बख्शे
गाँव पहुचे लुटे लुटाये हम
हक़ हमें है गुनाह का आदम
आखिरस हैं तेरे ही जाए हम 
 भूल बैठे, बनी जब अपने पर
फलसफे सब रटे रटाये हम

  ख्वाहिशों ने कही ग़ज़ल लेकिन
एक भी शेर कह न पाए हम

शायरी का नशा चढ़ा जब से
होश में फिर कभी न आये हम

Tuesday, February 5, 2013

तू अगर बेहौसला होता नहीं


तू अगर बेहौसला होता नहीं
देख कर हमदर्द को रोता नहीं 

फिक्र होती है नए दिन की उसे
चैन से सूरज कभी सोता नहीं

साथ सदियों से समंदर है मगर
साहिलों में ज़िंदगी बोता नहीं

ख्वाब में बेदाग़ देखा है उसे
यूँ ही दरिया चाँद को धोता नहीं

दूरियाँ कितनी भी तै कर ले मगर
रास्ता मंजिल कभी होता नहीं

हम अगर मुंसिफ की नीयत जानते
तो मुखालिफ फैसला होता नहीं





Saturday, November 10, 2012

कुछ सहमे कुछ गूंगे शब्दों में एहसास पिरोता हूँ

कुछ सहमे कुछ गूंगे
शब्दों में एहसास पिरोता हूँ

अभिलाषाओं की चादर से 
मुह ढक कर मैं रोता हूँ   
आज लेखनी थकी हुई
कुछ कहने को आतुर भी है
मेरे मन में
सधे, सहेजे भावों का अंकुर भी है
मैं फटही चादर के नीचे
सिंह द्वार पर सोता हूँ
कुछ सहमे कुछ गूंगे
शब्दों में एहसास पिरोता हूँ

मेरे शब्दों को पढ़कर
कुछ रोते, कुछ मुस्काते हैं
कुछ अपनी अंधी, उदास
मानवता को उकसाते हैं
मैं निराश-जन के मन में
आशा के अंकुर बोता हूँ
कुछ सहमे कुछ गूंगे
शब्दों में एहसास पिरोता हूँ

मुझको लूटा राजाओं ने
पूजा चन्द फकीरों ने
आजादी मुझको दी है
कुछ वीरों की शमशीरों ने
उनके अहसानों का बोझ उठाता  हूँ,
खुश होता हूँ
कुछ सहमे कुछ गूंगे
शब्दों में एहसास पिरोता हूँ




Tuesday, November 6, 2012

तुम्हारी ज़ुल्फ़ चेहरे पर बिखर जाती तो क्या होता

तुम्हारी  ज़ुल्फ़ चेहरे पर बिखर जाती तो क्या होता
हसीं  मुस्कान पर बिजली सिहर जाती तो क्या होता

तुहारी नाक के मोती से छिटकी इक किरन कोई
किसीके दिल से होकर जो गुजर जाती तो क्या होता

तुम्हारे रूप पर होकर फ़िदा ठहरी तुम्हारी वय
कहीं  कुछ साल पहले ही ठहर जाती तो क्या होता

चढी जो जिस्म के जीने से शीतल चांदनी तुम पर
तुम्हारे  नूर पर वो आह भर जाती तो क्या होता

तुहारे सुर्खरू कोमल कपोलों से हिना लेकर
उषा अपना अगर श्रृंगार कर जाती तो क्या होता

तुहारी याद में जो जी रहा है, जेह्न से उसके
मुहब्बत की खुमारी जो उतर जाती तो क्या होता

Thursday, September 6, 2012

खुदी को कर दिया खुद से जुदा क्या

खुदी को कर दिया खुद से जुदा क्या
खुद अपने आप से तू है खफा क्या

 निखरती जा रही है बदनसीबी
इसे लगती नहीं है बद्दुआ क्या

खुदा तू सुन लिया करता था मन की
सदायें सुन के बहरा हो गया क्या 
चले जिस राह पर शेखो बिरहमन
जहन्नुम का वही है रास्ता क्या
जमाने की बहुत है फ़िक्र तुझ को
तू अपने आप से उकता गया क्या

बहुत मायूस लगता है मुसाफिर
 नहीं है याद मंजिल का पता क्या

कफस में लौट क्यूँ आया परिंदा
फिजाँ में बाज़ का चर्चा हुआ क्या
जिन्हें मुफलिस कहा करती है दुनिया
निहाँ उनमे ही रहता है खुदा क्या

सिहर जाते हैं जिसको देख कर सब 
उसी को देख कर बच्चा हंसा क्या 
खफा क्यूँ हैं मेरे अहबाब मुझसे
पता मेरी ख़ुशी का चल गया क्या