Wednesday, November 3, 2010

ऐसी हो अब की दीवाली

अँधेरा मिटाने को एक दीप मेरा भी
हौसला बढेगा गर साथ मिले तेरा भी 

ढूंढें हर उस घर को जिसमे अँधेरा हो 
रख दें एक दीप वहाँ तेरा या मेरा हो 

रीती आँखों में खुशियाँ थोड़ी भर दें
मुस्काये हर चेहरा ऐसा कुछ कर दें

हर घर में एक राम राजा बन जाए
हर घर अयोध्या हो खुशियाँ मनाये

राम करे ऐसी हो अब की दीवाली
जितना भी बाँटें पर जेब हो न खाली 






Tuesday, November 2, 2010

दीवाली

हे लक्ष्मी माँ अबकी बारी उनकी भी सुध लो
जिनके घर न दीपक बाती गोंद उन्हें तुम लो
जिनके घर में जलती न हो चूल्हे में भी आग
ऐसा कुछ कर दो माँ अबकी जागें उनके भाग
बच्चा उनके घर में कोई भूखा न सो जाय
पूड़ी खीर भले न खावें पर चेहरा खिल जाय
माँ कि हँसी न हो बनावटी झूठा लगे न बाप
स्वागत करने उठा कोई भी हाथ न जाए काप
मुफलिस के तन को दे कपड़ा मन में दीप जला
होगी मेरी यही दिवाली सब का होए भला
अखलाकन न हँसे कोई मन रहे न कोई उदास
इस दीवाली मेरी तुझसे बस इतनी सी आस

बिरही

मुझे सताए सजना, जाए प्रीत निगोड़ी जाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

तेरो अंग लगूँ तो लागे हर दिन मोको फाग 
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

चले गए परदेस सजनवा, फूट्यो  मेरो भाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

चाँद सुलगता लागे मोहे, फूल दहकती आग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

हार गले का, पाँव पैजनी लिपटें जैसे नाग 
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

बिन तेरे माथे कि बिंदिया, लगे जले का दाग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग

चाहे कितना सज लूँ साजन, सूनी रहती माँग
छू के मुझको लगा गए क्यूँ तन में मेरो आग 

Monday, November 1, 2010

मियाँ जमीर

बहुत दिनों से सोच रहा था
की मैं भी फेसबुक पे जवान हो जाऊँ.
बदल दूँ प्रोफाइल की फोटो
और हटा दूँ जन्म तिथि से साल.
बस इतना ही तो करना होता है.
फिर लिखूं कुछ चटपटी शायरी,
उम्र के हिसाब से
और बना लूँ बहुत सी कन्याओं को दोस्त.
पर क्या करूँ?
मेरे अन्दर एक सख्स ने
अपना स्थाई निवास बना रखा है.
ये हैं मियाँ जमीर.
जनाब कुछ करने ही नहीं देते.
जब देखो उठ के खड़े हो जाते हैं.
बखेड़ा खड़ा कर देते हैं साहब.
सोने नहीं देते
जब तक मान न ली जाय
इनकी बात .
सो मैंने इनके डर से ही
इस पुनीत इच्छा को दबाया
और बने हैं अट्ठावन के.
अब जो भी हो
कम से कम मियाँ जमीर तो खुश हैं.

फिक्र

 क्या वजह है कि उनसे दूर न रहा जाए
जिनसे दो बोल हलावत से न कहा जाए 

हो गया दूर मैं तुम्हारी जिन्दगी से ही 
जिसको आना हो वो पास तेरे आ जाए

रखना दूर जरा अपने को तुम अपने से 
न हो ऐसा कि आने वाला भी चला जाए

तन्हाई तुम्हारी करती है मुझे खौफज़दा
सोचता हूँ कि क्यूँ न साथ ही रहा जाए 

मुझे अपनी नहीं परवाह, पर तुम्हारी है
सब्र तेरा कहीं तुमको ही न ठुकरा जाए

हम तुम्हे जानते न होते तो चुप हो जाते
कहीं गम तेरा मेरी मुश्किल न बढ़ा जाए

याद करता हूँ जब गुजरे हुए जमाने को
दिल मेरा कहता है अब दूरी को भरा जाए 

चलो हम फैसला आज एक कर ही लेते हैं 
रहें. गुस्से. में  चुप पर साथ ही रहा जाए